हां शायद इसलिए कि ऐसी करामात भी तो प्यार ने मुझे पहले कभी नहीं दिखाई थी।पल गिनते गिनते गुज़र ही गए, रात हो ही गई और वह समय आ ही गया। मैंने बाजी के रूम के डोर पे नोक किया, एक पल भी नहीं बीता कि दरवाजा खुल गया, शायद आज जो आग इधर लगी थी और ऐसी ही आग उधर भी लगी थी। दरवाजा खुलने के बाद, जहां था वही पे जाम होकर तो रह गया, सांसें रुक ही सी तो गईं आंखें झपकाना एक पाप सा लगने लगा तब, काले रंग का सूट सलवार पहने वह हूर अपनी पूरी ग्लो से प्रकट हो रही थी।“क्या है?” वह मुझसे मुखातिब हुई।मैं वैसे ही उसकी सुन्दरता में डूबे हुए बोला “जी कुछ नहीं”.मैं जैसे अपने आप में रहा ही नहीं, उसके हुस्न के जादू की पकड़ में आ गया था। पहले से ही ऐसी बेचैनी का समुंदर अपने अंदर लिए, तड़पता हुआ तो आया था उसके पास, ऊपर से जो सितम मुझ बेचारे दीवाने पे जो किया उसके हुष्ण ने तो सह न पाया यह सब। मैं ऐसे ही उसके हुस्न मे खोया हुआ आगे बढ़ा और हूर को अपनी बाँहों में ले लिया।बाजी भी शायद इन्ही पलों के इंतजार में थी, उन्होने भी मुझे अपने से लगा लिया और मेरी कमर पे प्यार से हाथ फेरने लगी। जाने कितना ही समय















