मैं वैसे ही दरवाजा देख कर और वो अवजा सुनकर वापस आंटी के यहाँ चली जाती थी, आती तब थी जब कोई फिर बुलाने आता था, वापस आके मैं माँ को देखती थी.उनके हाथ में कांच की चूड़ियों के निशान होते थे, और कई बार चूड़ियों के टूटने की वजह से जख्म होता था, मैं पूछती थी, की माँ ये कैसे हुआ, तो वो है के टाल देती थी , अरे ये ये तो बेलन से चूड़ियों में लग गया था चूड़ी टूटने की वजह से कांच गड गया था.मेरा कोमल मन भी सब कुछ समझता था, पर मैं लाचार थी, जहा सावन ही आग लगाये तो कौन बुझाए, यही गाना मुझे याद आने लगता था, जब मेरा बाप ही अपनी पत्नी को गैर मर्दों के पास सेक्स करने के लिए मजबूर करता था, तो मैं क्या कर सकती थी, सिलसिला चलता रहा.एक बार तो हद हो गई, माँ नानी के यहाँ जाने के बहाने वो चंद्रकांत अंकल के साथ हनीमून पे गई थी, टाइट जीन्स और शर्ट पहन कर, मेरी माँ देखने में काफी सुन्दर है, काफी हॉट है, पर वो जीन्स वगैरह नहीं पहनती थी, पर उस कुत्ते की वजह से मेरी माँ को उसके साथ हनीमून पे जाना पड़ा.















