मैंने कहा।मनोज ने मेरे हाथ अपने हाथ में लिए और बोली, “मुझे आप की चुदाई देखनी है”।मैं हैरान हो गयी। इस बात की तो मुझे उम्मीद नहीं थी। पर फिर भी मैं बोली, “ठीक है, पर देखोगी कैसे”?“बस अंकित के कमरे की खिड़की थोड़ी खोल कर रखना”।मैंने मधु की तरफ देखा और हाँ में सर हिला दिया, “खिड़की थोड़ी खोल कर रखना”।तो क्या माँ के कमरे की खिड़की भी जान बूझ कर खुली रखी गई थी ? XXXBF ”“अभी पता लग जाएगा, आ जाओ”।मैं उसके साथ लेट गयी। ट्रेलर फिर शरू हो गया। उसके हाथ मेरी चूचियों पर और मेरी चूत पर और मेरा हाथ उसके लंड पर। दस बारह मिनट के बाद अंकित उठा और बोला, “चलो अब पीछे से करेंगे”। गरम तो मैं हो ही चुकी थी। जिस चूत को थोड़ी देर पहले साफ़ कर के तौलिये के साथ पोंछ कर आयी थी वो फिर गीली हो चुकी थी।मैं उठी और कोहनियां बिस्तर पर टिका कर टांगें चौड़ी करके खड़ी हो गयी और अंकित के लंड का इंज़ार करने लगी। “अंकित लंड अंदर डाल क्यों नहीं रहा, क्या कर रहा है”!















